सनातन धर्म
सनातन शब्द संस्कृत से लिया गया है, ”सनातन“ जो शाश्वत है, जिसका न आदि है न अंत, जो समय और स्थान से परे हो, जो ब्रह्मांड के अस्तित्व का आधार बनता है। ”सनातन“ का अर्थ है – जो सदा से है और सदा रहेगा। इसलिए सनातन धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण पद्धति या शैली है। यह किसी एक व्यक्ति, स्थान या समय से शुरू नहीं हुआ, बल्कि यह आदि अनादि काल से है। इसमें प्रकृति, आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष जैसे गहरे आध्यात्मिक सिद्धांत शामिल हैं।
सनातन धर्म हमें सिखाता है कि संसार में हर जीव में ईश्वर का अंश है फिर चाहे वह मनुष्य हो, पशु हो, पेड़-पौधे हों या प्रकृति इसलिए सनातन धर्म में कहा जाता है- ”अहं ब्रह्मास्मि“ अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ ।
सनातन धर्म का एक वाक्य है- “वसुधैव कुटुंबकम्” जिसका अर्थ है, “पूरी पृथवी ही एक परिवार है”
सनातन धर्म में मानव जीवन के चार मुख्य उदेश्य माना गया है धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष। जिसमें कहा गया है कि मानव को धर्म (कर्त्तव्य)का पालन करते हुए अर्थ (धन) से काम (इच्छा-सुख) प्राप्त कर अंततः मोक्ष (जीवन मरण से मुक्ति) पाना ही जीवन का उदेश्य है।
सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथः-
चार वेद – जिसे सनातन धर्म का मूल भी कहा जाता है:-
- ऋग्वेद – सबसे पहला और सबसे पुराना वेद है। इसमें देवताओं की स्तुति और प्रार्थनाएं (मंत्र) लिखे गए हैं। कुल 10 मंडल, 1028 सूक्त और लगभग 11,000 मंत्र हैं। इसमें अग्नि, इंद्र, सूर्य, वायु आदि देवताओं का वर्णन मिलता है व उस समय की प्रकृति, नदियां, स्थान और लोगों के जीवन की जानकारी भी मिलती है।
- यजुर्वेद – यह यज्ञ और कर्म का वेद है, इसमें यज्ञ कैसे करना है, कौन-सा मंत्र कब बोलना है, इसकी पूरी विधि बताई गई है। यह गद्य (सीधी भाषा) में लिखा गया वेद है। इसमें कर्म, आत्मा, ब्रह्म और ईश्वर का ज्ञान भी समझाया गया है। इसके दो भाग हैंः शुक्ल यजुर्वेद, कृष्ण यजुर्वेद
- सामवेद – यह संगीत और भक्ति का वेद है, इस वेद गाकर पढ़ा जाता है कृ इसलिए इसे संगीत का मूल माना जाता है। इसके अधिकतर मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं लेकिन उन्हें सुर और राग में ढाला गया है। इसमें मुख्य रूप से अग्नि, इंद्र और सूर्य की उपासना है। कुल लगभग 1824 मंत्र हैं।
- अथर्ववेद – इसमें स्वास्थय और जीवन उपयोगी ज्ञान है। इसमे उपचार, औशधी, व स्वास्थय संबंधित जानकारी मिलती है।
पुराण:-
सनातन धर्म में 18 प्रमुख पुराण है -1. ब्रह्म पुराण, 2. पद्म पुराण, 3. विष्णु पुराण, 4. वायु पुराण, 5. भागवत पुराण, 6. नारद पुराण, 7. मार्कण्डेय पुराण, 8. अग्नि पुराण, 9. भविष्य पुराण, 10. ब्रह्मवैवर्त पुराण, 11. लिङ्ग पुराण, 12. वाराह पुराण, 13. स्कन्द पुराण, 14. वामन पुराण, 15. कूर्म पुराण, 16. मत्स्य पुराण, 17. गरुड़ पुराण, 18. ब्रह्माण्ड पुराण।
इसमें भगवान की कथा व उन्हे पाने का मार्ग है।
रामचरितमानस-
इसमें संत तुलसीदास के द्वारा अवधी भाषा में रचित एक महाकाव्य है, जो भगवान राम के जीवन चरित्र, आदर्शों, और भक्ति का वर्णन करता है। यह 7 काण्डों (बालकाण्ड से उत्तरकाण्ड तक) में विभाजित है, जिसमें चौपाइयों और दोहों के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम की लीलाओं और जीवन मूल्यों को समझाया गया है।
भगवत गीता-
इसमें महाभारत में कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है। यह 18 अध्यायों और 700 श्लोकों का एक पवित्र ग्रंथ है, जो मुख्य रूप से कर्म, भक्ति, ज्ञान, धर्म और आत्मा की अमरता पर केंद्रित है। इसमें निष्काम कर्म (फल की इच्छा के बिना कार्य करना) का मार्ग सुझाया गया है।
16 संस्कार
सनातन धर्म में मानव के लिए 16 संस्कार होते है। जिसमें गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक शामिल हैं, जो जीवन के विभिन्न पड़ावों को दर्शाते हैं।
- गर्भाधानः पहला संस्कार, उत्तम संतान प्राप्ति के लिए।
- पुंसवनः गर्भ के तीसरे या चौथे माह में, स्वस्थ व मेधावी संतान के लिए।
- सीमन्तोन्नयनः गर्भ के छठे-आठवें माह में, माँ की प्रसन्नता और बालक की मानसिक वृद्धि हेतु।
- जातकमर्ः जन्म के समय किया जाने वाला संस्कार, पिता द्वारा शिशु को शहद/घी चटाना।
- नामकरणः जन्म के 11वें या 12वें दिन, बच्चे का नाम रखना।
- निष्क्रमणः जन्म के चौथे माह में, सूर्य-चंद्रमा का दर्शन कराना।
- अन्नप्राशनः छठे माह में, शिशु को पहली बार अन्न (खीर) खिलाना।
- चूड़ाकर्म (मुंडन): पहले या तीसरे वर्ष में सिर के बाल हटाना।
- कर्णवेधः कानों को छेदना (स्वास्थय और सुंदरता के लिए)।
- विद्यारम्भः अक्षर ज्ञान की शुरुआत।
- उपनयन (यज्ञोपवीत/जनेऊ): शिक्षा शुरू होने से पहले जनेऊ धारण करना।
- वेदारम्भः वेदों और शास्त्रों का अध्ययन शुरू करना।
- केशान्तः गुरु के सान्निध्य में प्रथम बार बाल कटवाना।
- समावर्तनः शिक्षा पूरी कर गुरु आश्रम से घर लौटना।
- विवाहः गृहस्थ जीवन में प्रवेश का संस्कार।
- अंतिम संस्कारः जीवन का अंतिम संस्कार (दाह संस्कार)।
33 कोटि देवी-देवता
सनातन धर्म में 33 कोटि देवी-देवता का वर्णन मिलता है। संस्कृत में कोटि का अर्थ (प्रकार/श्रेणी) से है। 33 कोटि(प्रकार) जिसमें 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, 1 इंद्र (या प्रजापति) और 1 अश्विनी कुमार (या दो अश्विनी कुमार) शामिल हैं।
चार पुरुषार्थ
सनातन धर्म में जीवन के चार मुख्य लक्ष्य बताए गए हैंः
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
- धर्म – धर्म का आश्य है ईमानदारी से काम करना, सच बोलना, न्याय करना, अपने कर्तव्यों को निभाना व दूसरो को कष्ट न देना। यानी धर्म हमें बताता है कि जीवन कैसे सही तरीके से जिया जाए। यह व्यक्ति या समाज को चलाने का आधार है।
- अर्थ – जीवन चलाने के लिए पैसे की जरूरत होती है। धर्म के मार्ग पर चलकर कमाया गया धन ही अर्थ कहलाता है।
- काम – काम का अर्थ सिर्फ वासना नहीं, बल्कि जीवन जीने के संसाधन से है ।
- मोक्ष – मोक्ष जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है। जब इंसान लालच, दुख-सुख और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर परमात्मा में लीन हो जाता है, उसे मोक्ष कहते हैं। यानी आत्मा का भगवान से मिल जाना।