Ekadashi हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र दिन माना जाता है। यह हर महीने में दो बार आती है कृ एक बार शुक्ल पक्ष (चाँद बढ़ने का समय) में और एक बार कृष्ण पक्ष (चाँद घटने का समय) में। यानी साल में लगभग 24 एकादशियाँ होती हैं, और कभी-कभी अधिमास (अधिक माह) आने पर ये संख्या 26 तक भी पहुँच जाती है।
एकादशी को भगवान विष्णु की पूजा और उपवास के लिए समर्पित दिन माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन सच्चे मन से उपवास करता है और भगवान विष्णु का नाम लेता है, उसे पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में शांति तथा सुख की प्राप्ति होती है।
Ekadashi in November 2025
- 2 November, Sunday – Devuthni Ekadashi
- 15 November, Monday – Utpanana Ekadashi
एकादशी व्रत का नियम:-
- एक दिन पहले यानी दशमी की रात से ही व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
- एकादशी के दिन अनाज, चावल और दाल नहीं खानी चाहिए।
- केवल फलाहार या दूध का सेवन किया जाता है।
- पूरे दिन भजन, कीर्तन और विष्णु भगवान के नाम का जाप करना चाहिए।
- अगले दिन द्वादशी को व्रत तोड़ा जाता है, जिसे पारणा कहा जाता है।
26 एकादशी के नाम:-
- Utpana Ekadashi – उत्पन्ना एकादशी
- Mokshada Ekadashi – मोक्षदा एकादशी
- Saphala Ekadashi – सफल एकादशी
- Putrada Ekadashi – पुत्रदा एकादशी
- Sattila Ekadashi – षट्तिला एकादशी
- Jaya / Bhaimi Ekadashi – जया / भैमि एकादशी
- Vijaya Ekadashi – विजय एकादशी
- Amalaki Ekadashi – आमलकी एकादशी
- Paapmochani Ekadashi – पापमोचनी एकादशी
- Kamada Ekadashi – कामदा एकादशी
- Varuthini Ekadashi – वरूथिनी एकादशी
- Mohini Ekadashi – मोहिनी एकादशी
- Apara Ekadashi – अपरा एकादशी
- Nirjala Ekadashi – निर्जला एकादशी
- Yogini Ekadashi – योगिनी एकादशी
- Sayana / Padma Ekadashi – शयन / पद्मा एकादशी
- Kamika Ekadashi – कामिका एकादशी
- Pavitropana Ekadashi – पवित्रोपना एकादशी
- Aja / Annada Ekadashi – अजा / अन्नदा एकादशी
- Parivartini / Parsva Ekadashi – परिवर्तिनी / पार्श्व एकादशी
- Indira Ekadashi – इन्दिरा एकादशी
- Papankusha Ekadashi – पापांकुशा एकादशी
- Rama Ekadashi – रमा एकादशी
- Haribhodini / Utthana Ekadashi – हरिभोदिनी / उत्थान एकादशी
- Adhik Maas – Padmini Ekadashi – अधिक मास / पद्मिनी एकादशी
- Parama Ekadashi – परम एकादशी
एकादशी की पौराणिक कथा:-
सतयुग में मुर नाम के एक दैत्य ने इंद्र समेत सभी देवताओं को परास्त कर दिया। डरे हुए देवता मदद के लिए भगवान शिव के पास गए। शिवजी ने उन्हें विष्णु जी के पास जाने की सलाह दी। देवताओं की प्रार्थना सुनकर क्षीरसागर में विश्राम कर रहे विष्णु जी जाग गए। वे मुर दैत्य का वध करने चन्द्रावतीपुरी गए। वहाँ उन्होंने सुदर्शन चक्र से असंख्य दैत्यों को मार डाला। इसके बाद वे बद्रिका आश्रम की सिंहावती गुफा में विश्राम करने चले गए। यह गुफा 12 योजन लंबी थी। मुर को जब पता चला कि उसे मारने के लिए श्री हरि उसके पास आने वाले हैं, तो उसने निद्रा में ही श्री हरि को मारने का प्रयास किया। गहरी निद्रा में सो चुके विष्णु को पता ही नहीं चला कि उन्हें जैसे ही मारने का विचार किया, वैसे ही श्रीहरि विष्णु के शरीर से एक कन्या निकली और उसने मुर दैत्य का वध कर दिया। मूर राक्षस की आवाज सुनकर जब विष्णु जी नींद से जागे, तो उनके सामने एक कन्या खड़ी थी।
भगवान विष्णु ने एक कन्या से उसका परिचय पूछा। कन्या ने बताया कि उसका नाम एकादशी है और वह विष्णु के शरीर से ही उत्पन्न हुई है। उसने यह भी बताया कि उसने मुर नामक राक्षस को विष्णु के आशीर्वाद से मारा है। प्रसन्न होकर विष्णु ने एकादशी को सभी तीर्थों में श्रेष्ठ होने का वरदान दिया।